Saturday, December 31, 2016

Tuesday, November 15, 2016

कशमकश !









दिन-दोपहर मे नजर आ रहे इनको तारे हैं,
इस पार भी, उस पार भी,
सब 'फेंकू' की सर्जिकळ स्ट्राइक के मारे हैं,
इस पार भी, उस पार भी।

तंग-ए-हाल, छटपटा रहे आज हर तरफ,
जीव चोडे जबडों और मोटी चमडी वाले,
क्रेडिटकार्ड से घर चलाना पड रहा, और  
भरी तिजोरियों में लगे हैं मकड़ी के जाले।  

खारे जल में घड़ियाली आंसू बहाने को 
जहाँ -तहाँ ,मगरमच्छ भी बहुत सारे हैं,
इस पार भी, उस पार भी,
दिन-दोपहर मे नजर आ रहे इनको तारे हैं,
इस पार भी, उस पार भी।  


थूक दिया करते थे जो कलतक इधर-उधर,
पांच सौ - हजार रूपये का पान चबाकर,
आज वो घंटों लाइन मे लगकर एटीएम  की, 
खुश हो रहे हैं , पांच सौ- दो हजार पाकर। 

इनकी घूल-धुलसित शक्ळें बता रही है   
कि दुनिया में इनके जैसे भी वक्त के मारे हैं,
इस पार भी, उस पार भी,
दिन दोपहर मे नजर आ रहे इनको तारे हैं,
इस पार भी, उस पार भी।

दुनिया तो दाल में काला ढूढ़ रही, मगर, 
इनकी तो पूरी की पूरी दाल ही काली है,
किसे पता था कि वक्त ऐसी मार मरेगा,
बोर-बिस्तर नोटों से ठसे पड़े, जेब खाली है। 

अधोलोक के विचरणकर्ता, लगे बेचारे है,    
.इस पार भी, उस पार भी,
दिन दोपहर मे नजर आ रहे इनको तारे हैं,
इस पार भी, उस पार भी। 

चबाया करते थे जो कलतक कुक्कुट टंगड़ी, 
अपने ही घर की  दाल  समझकर, 
उड़ा देते थे महफ़िलों, गणिकागृहों में नोट, 
अपने ही बाप का माल समझकर।   . 

अचरज में अल्लाह के दुलारे, राम के प्यारे है,
इस पार भी, उस पार भी,
सब 'फेंकू' की "सर्जिकळ स्ट्राइक" के मारे हैं,
इस पार भी, उस पार भी।

Wednesday, November 9, 2016

लघु व्यंग्य : हर पति के दिन फिरते हैं।

८ नवम्बर, 2016 की देर शाम को जब थका हारा  दिल्ली के दमघोटू यातायात से जूझता हुआ दफ्तर से घर पंहुचा तो बैठक मे मेज पर तुडे-मुडे ५०० और १००० रुपये के नोटों का अम्बार देख  एक पल को चौंक सा गया। लगा कि दुनियां का सबसे ईमानदार कहा जाने वाला तबका यानि आयकर विभाग के हरीशचन्दों की मंडली आज मेरे घर मे भी आ धमकी है, कि तभी किचन से हाथ मे पानी का गिलास लेकर धर्मपत्नी कुछ बडबडाती हुई मेरी ओर बढी। मैने अंदर से अशान्त होते हुए भी शान्त स्वर मे पूछा, क्या माजरा है ये सब, भाग्यवान ?

मेरा इतना पूछना था कि यूं लगा मानों टिहरी डैम के कर्मचारियों ने डैम के सारे कपाट खोल दिये हों और डैम का सारा रूका पानी अपने पूरे बेग से देवप्रयाग की तरफ निकल पडा हो। बोली, अरे,  ये तो सचमुच का फेंकू निकला यार। कहता था, स्विस बैंक से ब्लैकमनी लाऊगा और १५-१५ ,लाख दूंगा सबको । कुछ देना लेना तो दूर, मैने तुम्हारी जेब से टपा-टपाके जो १०-१५ हजार रुपये  बटोर कर रखे थे, उन पर भी कम्वक्त ने आज सर्जिकल स्ट्राइक कर दी।


मैं अभी भी दुविधा मे था, अत: मैने अपने धैर्य के बचे खुचे भन्डार का इस्तेमाल करते हुए सहज भाव से पूछा, जानेमन, बहुत नाराज हो क्या ,क्यों इतना अत्याचार कर रही हो मुझपर ? मैने तो  परसों रविवार के दिन  सिर्फ एक पव्वे के पैसे मांगे थे तुमसे, और तुमने तो आज खजाना ही खोल दिया।  वो स्वभाव को नरम  करते हुए टीवी पर न्यूज चैनल  लगाते हुए बोली, वो देखो और सुन लो , अपने अजीज फेंकू  महाराज को, भक्तों को क्या भगवद्गीता का पाठ पढ़कर सुना रहे हैं।    खैर , चाय वाले को .......  बोलते, बोलते वह रुक सी गई , फिर बोली,  जाओ ,टेबल पर  से १००० का नोट ले जाओ और  पब्वे की जगह बोतल ही ले आना  तुम्हारा हफ्ते भर का गुजारा हो जायेगा। और हाँ, साथ मे तंदूरी चिकन भी ले आना अपने लिए। 

पतियों के इससे अच्छे भला क्या दिन आते, मै, हजार का एक नॉट मुट्ठी में दबा ,झटपट मोदी जी की जय बोलकर, नजदीकी मन्दिर के लिए निकल पडा।

Monday, October 31, 2016

हमने जो सोशल मीडिया पर छितराया

पैदाइशी गूंगों को भी भरी महफ़िल में मुह खोलते देखा है,  
गम से भरे गिलासों में ख़ुशी को इंच-इंच तोलते देखा है,
कौन कहता है कि हरतरफ सिर्फ झूठ का ही बोलबाला है, 
हमने मयकदे में बैठे हुए हर शख्स को सच बोलते देखा है। 



फुटपाथ पर सोया हुआ एक मजदूर 
अचानक हड़बड़ाते हुए जागा,
पास से गुजरते हुए मैंने 
जब पूछा कि क्या हुआ ?
मुस्कुराता हुआ बोला, 
कुछ नहीं साहब, हम जैसे कमबख्त लोग 
सपने भी तो उन महलों के देखते है, 
जहां अमीरों को नींद नहीं आती।    



हर मर्ज का इलाज न रखना, 
असूल है दवाखाने का, 
क्योंकि उसे भी ख्याल रहता है 
'भ्रातृश्री' मयखाने का।



शुभचिंतक जब ये समझा रहे थे कि बेटा, सब्र का फल मीठा होता है,
तभी, जो खुशनुमा वक्त अपने साथ था, वो भी चुपके से निकल गया।

  


Friday, September 16, 2016

जाने कहाँ खो गया !



वक्त के थपेड़ों संग,
न जाने कहाँ खो गया,
बचपन में मिला था जो खजाना मुझको।   

नन्हें हाथों को
चारपाई के पायों पर मारकर
बजाया करता था जिन्हें शौक से ,
चांदी की वो एक जोड़ी धागुली,
मेरे नामकरण पर, जो दे गए थे,
मेरे नाना मुझको।
वक्त के थपेड़ों संग,
न जाने कहाँ खो गया,
बचपन में मिला था जो खजाना मुझको।।

बड़े चाव से खाता था, जिसपर,
छांछ और झंगोरे का
वो स्वादिष्ट पहाड़ी व्यंजन,
'छंछेड़ी' नाम था जिसका,        
कांस की वह रकाबी,
बचपन में जिसपर दादी माँ
परोसती थी खाना मुझको।
 वक्त के थपेड़ों संग,
न जाने कहाँ खो गया,
बचपन में मिला था जो खजाना मुझको।।

यूं तो खोई हुई चीज के इसकदर,
अनुरागी हम हरगिज न रहे, 
जिंदगी में उतार-चढ़ाव के मौसम,
बहुत आये और गए,
मगर, वो अपने पहाड़ी गाँव का मौसम,
सांझ ढलते, आहिस्ता -आहिस्ता
डूबता सूरज, घाटी से आगे खिसकता
विशालकाय पहाड़ों का प्रतिविम्ब,  
जो बेइंतहां  भाता था सुहाना मुझको।
वक्त के थपेड़ों संग,
न जाने कहाँ खो गया,
बचपन में मिला था जो खजाना मुझको।।

नन्ही सी जान और  "पहाड़ी सकूल", 
गुरूजी  की "गुरु दक्षिणा" लेकर
रोज सुबह मीलों पैदल चलना,
'बौरू' नाम था  वहाँ उसका,,
कभी  सेर भर गेंहू , जौ , झंगोरा, चावल ,
तो कभी एक अदद सी  लकड़ी,
गुरूजी के चूल्हे के लिए ,
नहीं इंतजाम हो पाया किन्ही बरसाती दिनों में, 
तो जिसे यहां सभ्य लोग 'बंक मारना', कहते है,
हमारे "लूकने" का वो अदद  ठिकाना  मुझको।  
वक्त के थपेड़ों संग,
न जाने कहाँ खो गया,
बचपन में मिला था जो खजाना मुझको।।

छुट्टी का दिन, घर पर कैसे रहे,
गाय, बकरियां हाँकी, जंगल गए,
दिनभर भूखे-प्यासे, गाढ और  डाँडो,
धार की नपाई कैसे सहें,
अपने और रिश्तेदारों के खेत से
ककड़ी, खीरा, और  फूट चुराने का
जो मिलता था बहाना  मुझको,
वक्त के थपेड़ों संग,
न जाने कहाँ खो गया,
बचपन में मिला था जो खजाना मुझको।।

सुबह -सुबह, जिस भी घर से,
आती थी 'घूर-घूर' आवाज परेडे  के थिरकने की,
पहुँच जाता था 'ठेकी'  लेकर,छांछ मांगने,
और पूरा गाँव कहता था, छांछ का दीवाना मुझको। 
वक्त के थपेड़ों संग,
न जाने कहाँ खो गया,
बचपन में मिला था जो खजाना मुझको।।  

Wednesday, August 3, 2016

यत्र-तत्र बिखरे मोती

अमानत में खयानत की पगार पाकर खुश है जहां सिरफिरा, 
यूं कि बदस्तूर जिंदगी का बस यही मजा,बाकी सब किरकिरा, 
ज़रा पता तो करो यारों, ये बंदे कश्मीरी सब खैरियत से तो हैं,
बड़े दिनों से घर-आँगन हमारे, कोई पत्थर नहीं आकर गिरा।


कुछ उदास-उदास सा नजर आया इसबार, 
मेरे मोहल्ले की गली मे भरा बारिश का पानी,
यूं कि 
मां-बापों ने मोबाइल  थमा दिये हैं
कागज की नाव बनाने वाले नौनिहालों के हाथों मे


ये नींद भी कमबख्त, माशुका सी बन गई है ,
बुलाते रहो, मगर बेवफा रातभर नहीं आती।


जो 'AAPकी' नीयत साफ होती, तो
साथ आपके जनता, अपने आप होती,
न ही लुच्चे खुद को आमआदमी कहते,
और न ही लफंगौं की मनमानी खाप होती।


खूंटा कहीं कोई उखडा हुआ पाता हूं, अपने दिल के दरीचे मे जब कभी,
समझ जाता हूं, आजाद हो गया तेरा कोई ख्याल, जो मैने बांधे रखा था।


निमन्त्रण दे रहा हूं उनको, 
जिन्हें गुरूर है अपनी बेशुमार दौलत पर,
कभी वक्त निकाल, मेरे साथ चलना,
बादशाहौं का कब्रिस्तान दिखा लाऊगा ।


Friday, July 1, 2016

समाजपट

आजकल यदा-कदा  छिटपुट  दो चार लाइने शोसल मीडिया पर ही पोस्ट कर संतुष्ट हो जाते है।  अपनी उन कुछ काव्यपंक्तियों , शेरो इत्यादि  को यहाँ  ब्लॉग पर बटोर रहा हूँ ;
  
उपस्थित मित्रगण हमारी बेसब्री और
झुँझलाहट का मजा लिए जा रहे थे,
हमारी नजर उनके अंदाज पर थी
और वो हमें नजरंदाज किये जा रहे थे।






चिकनी चुपडी बातें कर,
मैने भी बिठाया
अपनी भोली सी बीवी को सर,
'इन्टरनेशनल वीमन डे' पर ।

अंतराष्टीय महिला दिवस पर समर्पित:-
अगर आपके घर के अगले गेट के बाहर से बीवी चिल्ला रही हो और पिछले गेट के बाहर से आपका कुक्ता भौंक रहा हो तो ग्यानी लोग कह गये कि पिछला गेट खोलो, क्यौंकि कुत्ता अन्दर आ जाने के बाद चुप हो जायेगा ।
अग्रिम छमा :-)

कलयुग मे यही हस्र होना था, काठ के उल्लुऔं का,
कुछ हमारी ही मूर्खता थी, कुछ जमाना बना गया ।

पानी फ्री मे पी गये जमुना का,
डालके दिल्ली के घडे मे कंकर,
और जीने की कला भी सिखा गए,
श्री-श्री रवि शंकर ।

कुछ लुच्चे, लफ्गौं की छीना-झपटी मे जब
एक "पहाडी घोडा" अपनी टांग गंवा बैठा,
तभी जा के ये अहसास हुआ 'परचेत' कि
इस बेदर्द जहां मे, हम 'मैदानी' गधे ही बेहतर ।

यहां की विरासतों ने हर तहजीब को इस खूबसूरती से उकेरा है,
कि अपने इस सनातनी मुल्क में, 'काण्ड' भी "सुन्दर" होते है।

कुछ यूं खो दिया खुदको हमने ऐ जिंदगी, तेरी तलाश में,
दिनभर बटवे में ढूढ़ते है तुझको और शाम को गिलास में।

हाल-ए-दिल !
जब पड़ोसन पूछ बैठी उनसे, हमारी खुशहाल जिंदगी का राज,
वह बोली, स्लिपर निशाने पे सही लगे तो हम खुश, वरना वो। 
और तंगदिल ज़माना, यकीं कर बैठा उनकी काबिले-उक्ति पर,
क्या करते, खुदा भी तो हमपर, कुछ इसतरह ही मेहरबान हुआ। 
न जाने क्यों अक्सर इस जहां ने, हमें कंटक ही दिये, 
हमने तो सदा ही सहृदय उनको, कुसुम निवेदित किये। 
ऐ दस्तूर-ए-ज़िंदगी, तुझे आजतक हम समझ न पाए,
झुकने को ये दुनियाँ, सज़दा समझ लेती है किसलिए।


" नित बदलता वक्त"
------------------
कभी कर्मठ जहां वाले,
अपनी मनपसंद शक्ल को
स्वमानस पटल पर अंकित किया करते थे, 
अब तो इस कदर आलसी हो गए
कि अंतरजाल के सहारे,
जुकरवर्ग के 'दरखास्त' "मुख-दर्ज" पर
चस्पा करते भी हैं तो जम्हाई लेकर।
सुविधा हेतु मिलता -जुलता अंग्रेजी अनुवाद :
Those were the days,
when diligent people used to
colonized in their heart
their darling saize.
Now a days,
we sluggish use zuckerberg's
'app' " facebook" to record
ours any charming image .

तरस आता है कभी-कभी अपनी जिन्दगी जुझारू पे,
सुबह को दवा पे जीते हैं, और शाम को दारू पे।  

अपने विकास के एजेंडे को 
अपने ही पास रखो, मोदी जी , 
लाइट आ गई, लाइट आ गई...... 
दिन में १० बार यह दोहराने से 
जिस ख़ुशी का एहसास मिलता है , 
अरे, वो तुम का जानो। 
प्यार-मुहब्बत में शक-शुबहा की ये मदें क्यों हैं,
परस्पर दिलों में दूरी नहीं, फिर ये सरहदें क्यों है,
उम्र गुजर गई है सारी, इसी जुस्तजू में, ऐ दोस्त,
कि जिंदगी के हर मोड़ पर इतनी मयकदें क्यों है।

है दुआ रब से बस इतनी कि तुम्हारी हर इक मुराद पूरी हो,
हमने तो जिन्दगी मे ऐ यार, कभी कोई आरजू ही नही की ।

 यूं अब तक जिये तो किसी और के रहमोंकरम पर ही हम,
किंतु ऐ हुजूर, खुद के लिए मांगी हुई दुआ सदा बेअसर ही गई । 
फ़क़त नौकरी बदलने से फजीहत कम नहीं होती,
मगर फिर भी नौकरी की अजीयत कम नहीं होती।            अजीयत=परेशानी
जहां भी चले जाओ, सब के सब लाले एक जैसे है, 
जितना भी नफ़ा दे दो इनकी नीयत कम नहीं होती।

मैं दायरों में रहूँ या फिर दायरों से निकलू,
मेरे ख्यालात,मेरे जज्बात सिर्फ तुम से है ,
तुम साथ हो तो मुकद्दर पे हुकूमत अपनी,
मेरे हर रिश्ते की सौगात, सिर्फ तुम से है।

ख़ुशी हुई यह जानकार 
कि मोदी जी शीघ्र ही 
"स्मार्ट सिटी" लॉंच करेंगे, 
मगर मन में सवाल ये है 
कि वाशिंदे तो 
अपने ही देश के लोग होंगे न ??? 

इसबार ख़्वाबों ने 
मन की मुराद पूरी कर दी,
'कल्पना' हमसफ़र बनी 
तो पंखों ने भी 
उड़ान लम्बी भर दी। 
रोज सुबह, दुआ मांगता हूँ कि मैं, रास्ता भूल जाऊं मैखाने का ,
और शाम ढले, मौका-ए-लुत्फ़, हिसाब भूल जाता हूँ पैमाने का।
कितनी ही बार खुद को समझाया,
साक़ी को भी खूब धमकाया 
कि कल से हमारी-तुम्हारी दोस्ती ख़त्म,
मगर आजतक वो कमबख्त 'कल ' नहीं आया।

अब भला और किस नाम से ताबीर करे इस रुत को ,
बगिया बदहाल है और माली के सिर पर बहार आई है। :-)  जय केजू  की 

Dekha Kalyug ka ye kaisa asool, 
fool ke sar par bhi khil gaye phool 

Wednesday, June 15, 2016

परिणीत सफर, रजत मुकाम


सुभग, सौम्य  मेहरबाँ  रब था, 
 चरम पे अपने यौवन जब था।


 जब होता मन चपल-चलवित,
 पुलकित होता हर इक लब था,
 जब बह जाते कभी जज्बातों में,
 अश्रु  बूँदों से भर जाता टब  था।
 चरम पे अपने यौवन जब था।

     
प्रफुल्लित, उल्लसित आह्लादित,

गिला न शिकवा, सब प्रसन्नचित,
पथ,सेज न पुष्पित, कंटमय थे, 
किंतु विश्रंभ सरोवर लबालब था।
चरम पे अपने यौवन जब था।।


नित मंजुल पहल दिन की होती, 
निशा ताक तुम्हें, चैन से सोती,

हुनर समेट लाता छितरे को भी, 
अनुग्रह,उत्सर्ग,अनुराग सब था।
चरम पे अपने यौवन जब था।


                                                               
दाम्पत्य सफ़र स्वरोत्कर्ष सैर,
मुमकिन न होता तुम्हारे वगैर,
नियत निर्धारित लक्ष्य पाने का ,
ब्यूह-कौशल , विवेक गजब था।
चरम पे अपने यौवन जब था।।



Friday, April 29, 2016

धन्य-कलयुग

है अनुयुग समक्ष, सकल संतापी,
त्रस्त सदाशय, जीवन आपाधापी,  
बेदर्द जहां, है अस्तित्व नाकाफी,  
मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।   

दिन आभामय बीते, रात अँधेरी,
लक्ष्य है जिनका, सिर्फ हेराफेरी, 
कर्म कलुषित, भुज माला जापी, 
मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।  

कृत्य फरेब, कृत्रिम ही दमको,
पातक चरित्र, सिखाता हमको ,   
अपचार की राह है, उसने नापी,
मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।      

धूर्त वसूले, हर बात पे अड़कर,
शरीफ़ न पाये, कुछ भी लड़कर ,
व्यतिरेक की आंच, उसने तापी,  
मुक्त हस्त जिंदगी, भोगता पापी।  

Thursday, April 28, 2016

मेरे लिए तुम....


मय-साकी-रिन्द-मयखाने में,
आधी भी तुम, पूरी भी हो,  
हो ऐसी तुम सुरा खुमारी,
'मधु' मुस्कान सुरूरी भी हो। 

मंथर गति से हलक उतरती,
नरम स्वभाव, गुरूरी भी हो.     
आब-ए-तल्ख़ होती है हाला,
तुम मद्य सरस अंगूरी भी हो। 
  
जोश नजर शबाब दमकता,  
देह-निखर, धतूरी भी हो,   
खान हो जैसे हीरे की तुम, 
सिर्फ नूर नहीं, कोहिनूरी भी हो। 
  
था जीवन नीरस तब तुम आई ,
 नहीं मांग निरा, जरूरी भी हो,     
अकेली केंद्र बिंदु ही नहीं हो,
तुम मेरे घर की धूरी भी हो।  


Friday, April 15, 2016

तजुर्बा

   

बेशक, तब जा के आया, यह ख़याल हमको,
जब दिल मायूस पूछ बैठा, ये सवाल हमको।


हैं कौन सी आखिर, 
हम वो काबिल चीज़ ऐसी,
करता ही गया ज़माना, जो इस्तेमाल हमको।


लाये तो हम थे किनारे,कश्ती को आँधियों से ,
किन्तु सेहरा सिर उनके चढ़ा, बबाल हमको।


ऐ जिंदगी, तूने हमें यूं सिखाया,जीने का हुनर,
'उदीयमान'* मिला उनको, और ढाल* हमको।


शिद्दत से निभाते रहे हम, किरदार जिंदगी का,
रंगमंच पर मुसन्न* चढ़ा गए, नक्काल हमको।



जाल में जालिम जमाने के, फंसते ही चले गए,
धोखे भी मिले 'परचेत', क्या बेमिसाल हमको।

उदीयमान = प्रगति 
ढाल - ढलान 
मुसंन = जबरदस्ती 


   

Saturday, March 5, 2016

बस यूं ही

जहां आज भी ज़िंदा हैं गुरुकुल, उसे अवध की सरजमीं कहते है,
जोखिम उठा, मेहनत से कमाकर जो खाए उसे उद्यमी कहते हैं,
किन्तु बदलती इस सभ्यता के दौर का एक सच यह भी है कि  
जो गद्दार व मुफ्तखोर है वो आजकल अपने को 'कमी' कहते हैं।





बागों के बंदोबस्ती दरख़्त हमारे भी सारे फलदार होते,
लॉकर, बोरिया-बिस्तरों में भरे हमने भी  कलदार होते,
फिर तेरी ये हेकड़ी  कौन सहन करता, ऐ टुच्ची नौकरी,   
जो कहीं हम भी सियासी तहसील के तहसीलदार होते।   

Saturday, February 27, 2016

यह देश कब जागृत और परिपक्व होगा ?



अभी हाल ही में एक अखबार की आरटीआई के उत्तर में रिजर्वबैंक  के जबाब से यह  खुलासा हुआ था कि सरकारी क्षेत्र के  बैंकों ने पिछले ३ सालों में १.१४ लाख करोड़ की डुबन्तु ऋण ( Bad Debts) की रकम बट्टे खाते में डाली है। इसे लुप्त भार (Charge Off ) के नाम से भी जाना जाता है,  जिसका वार्षिक विवरण इस प्रकार है ;
लोकसभा को दी गई जानकारी के हिसाब से सन २०१३ में बैंकों ने कुल २७२३१ करोड़ की ऎसी  रकम बट्टे खाते में डाली थी। इसी तरह २०१४ में ३४४०९ करोड़ और २०१५ में ५२५४५ करोड़ बट्टे खाते में डाली गई। 


cr

यहां यह जानना अत्यावश्यक है किसी भी  रकम अथवा ऋण को बट्टे खाते में डालने के लिए बैंको के  लिए कुछ नियम, कुछ प्रकियाएं हैं। और इन नियमों तथा परिक्रियाओं  के तहत किसी भी रकम अथवा ऋण को  गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (non-performing asset ) घोषित करने और उसके बाद उसे  bad debts मानकर बट्टे खाते में डालने में लगभग ३ साल लग जाते है।  

यहां यह भी स्पष्ट  कर देना उचित रहेगा कि बैंकों द्वारा अपने इन अप्राप्य नुकसान ( unrecoverable loss) को अपने तुलनपत्र ( बैलेंस शीट ) और आयकर विवरणी  (रिटर्न) में दर्शाने का मतलब यह नहीं है कि बैंकों ने  उन ऋणों को वसूलने के अपने अधिकार का अधित्यजन(waiver ) कर दिया है, और अब वे उसे अपने ऋणी से नहीं वसूल सकते।  बट्टे खाते में डालने के बाद भी बैंको को पूरा अधिकार होता है कि वे अपने पास हर उपलव्ध साधन जैसे ऋण वसूलने वाली एजेंसियां, ऋणधारक के ऋणदाता बैंक में मौजूद कोई अन्य परिसंपत्ति/खाते  को जब्त करके, दृष्टिबंधित संपत्ति को बेचकर इत्यादि से इस ऋण को वसूल सकते है।   

अब आपका ध्यान एक मजेदार बात पर खींचने  की कोशिश करता हूँ।  जो ऋण की रकम बैंकों ने २०१५ में बट्टे खाते (write off ) में डाली, वह ऋण संदिग्ध  ( Doubtful Debts ) कब हो गया था ?  सन २०१२-१३ में,  यानि  सन २०१२-१३ में ही इन बैन के ऋणदाताओं ने ऋण लौटाने में बदमाशी अथवा अपने को असमर्थ (दिवालिया) घोषित कर दिया था।   इसी तरह जो रकम २०१४ में बट्टे खाते में गई वह २०११-१२ में संदिग्ध ऋण बन गई थी और २०१३ वाली रकम २०१०-११ में। साथ ही यह भी बात आप लोग जानते होंगे कि सार्वजनिक क्षेत्र  के  बैंको द्वारा जहां २००२-२००३ में सिर्फ ४% ही ऋण बट्टे खाते में डाले गए थे वहीं ये बट्टेखाते के ऋण सन २०१२-१३ में ६० % तक जा पहुंचे। 

अब सीधा सा सवाल, जब ये  ऋण रकमें, संदिग्ध ऋण  ( Doubtful Debts )  बनी तब देश में सरकार किसकी थी ?     बहुत पुरानी  बात नहीं है, अभी जब उस कथित आरटीआई से यह खुलासा हुआ तो आपने शायद नोट किया होगा, किस तरह कुछ निहित हित मीडिया घरानो, क्षद्म सेक्युलरों और वाम भक्तों ने इसे मोदी सरकार की  एक बड़ी नाकामी के रूप में पेश किया।  कुछ ने तो यहाँ तक कह दिया कि  मोदी सरकार  ने उन औद्योगिक घरानो को ऋण माफी का तोहफा दे दिया जिन्होंने इनके लिए चुनाव खर्च का इंतजाम किया था। मगर किसी ने यह  परिभाषित करने की कोशिश नहीं की अथवा जानबूझकर इसे  दबाया कि यह डूबंतु रकम किस सरकार के दौरान की है। और ये सब वही लोग है जो आजकर देशद्रोहवाद, अराजकवाद, आतंकवाद और  last but not least ,  JNUवाद के समर्थक और शुभचिंतक बनकर घूम रहे हैं।    12717577_1694003777504719_25407693530748 

अवश्य ही यह एक चिंतनीय विषय है कि बैंक  इतनी बड़ी मात्रा में ऋण की रकमों को बट्टे खाते में डाल रहे है और इसके लिए जबाबदेही तय होनी चाहिए किन्तु क्या जो हम और हमारा मीडिया दर्शा रहा है , देश की अर्थव्यवस्था के प्रति क्या हमारा इतना ही उत्तरदाईत्व बनता है कि हम स्वार्थ पूर्ती के लिए किसी और का पाप किसी और के सर मढ़कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लें ?  बस, रह रहकर अफ़सोस के साथ यही कहना पड़ता है कि अपना यह देश कब जागृत और परिपक्व होगा ?

जागो सोने वालों जागो !    

Thursday, January 7, 2016

इस मुल्क की तहज़ीब-ए-वीआईपी - १

इस मुल्क की तहज़ीब-ए-वीआईपी  - १ 
यह एक सर्वविदित सत्य है कि  तीन लम्बी गुलामियत का दंश झेल चुका इस मुल्क का वह प्राणी जो सुबह से शाम तक का  अपना वक्त सिर्फ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के जुगाड़ में ही व्यतीत कर देता है, उसके दिल में जाति, धर्म और सम्प्रदाय से परे, एक ख़ास किस्म का मक्कार वर्ग, अपने द्वारा पैदा की गई  एक ख़ास किस्म की दहशत की पैठ बनाने में  हमेशा सक्षम रहा है।  

इसी का नतीजा था कि पड़ोसी मुल्क  के कुछ दहशगर्द  बेख़ौफ़ एक नीली बत्ती लगी गाड़ी के माध्यम से पठानकोट के वायुसेना बेस में घुस गए और हमारे १०  वीर जवानो को अपने प्राणो की आहुति देनी पड़ी। अब सवाल यह उठता है कि आम जनता को बड़ी-बड़ी नसीहतें देने वाला यह वर्ग-ए-तहज़ीब-ए-वीआईपी, क्या खुद अपने लिए यह नियम बनाएगा कि आज  के बाद से हर वीआईपी वाहन को उसके मार्ग में पड़ने  वाले किसी भी सुरक्षा चेक-पोस्ट पर चेकिंग करवाना अनिवार्य होगा और  ऐसा न करने पर सुरक्षा चेक-पोस्ट पर तैनात सुरक्षा-कर्मी को उसके उल्लंघन कर्ता चालक को देखते ही गोली मारने का अधिकार होगा ?  शायद  कभी नहीं, ऐसे नियम  के बारे में  तो सोचना ही बेईमानी है। 



                     इस मुल्क की तहज़ीब-ए-वीआईपी  - २ 

inside delhi metro


 अब  ज़रा दूसरा पहलू देखिये।   अस्थमाग्रस्त यही विशिष्ठ वर्ग, इसको अगर  ज़रा सा  भी  खांसी -जुकाम  हो जाए तो  बढ़ते वायु प्रदूषण की दुहाई देकर उस आम प्राणी  के लिए कठोर नियम बनाने में ज़रा भी कोताही नहीं करता, जिसने इसे आम से ख़ास बनाया। अब चाहे आम  प्राणी  को  कितनी भी मुसीबतों का सामना क्यों न करना पड़े।  दिल्ली में -सम -विषम नंबर वाली गाड़ियों का ही उदाहरण देख लो।  यह सर्वविदित है  कि  इस विशिष्ठ वर्ग ने कभी भी , इस आम प्राणी के लिए सुविधाजनक  सार्वजनिक परिवहन की कभी कोई चिंता नहीं की।  क्या सार्वजनिक  परिवहन पर्याप्त मात्रा में  उपलब्ध है भी या नहीं, कभी नहीं सोचा । 

किन्तु इसे ज़रा सी खांसी  हुई और इसने  न सिर्फ उस आम प्राणी को  बल्कि उसके पूरे परिवार को  ही बीमारी के  मुह में धकेल दिया।  आप पूछेंगे वह कैसे  ? तो इसका जबाब भी सुन लीजिये।   पीक हावर्स  में आप किसी मैट्रो के डिब्बे  अथवा डीटीसी की  बस में  चढिये , सारे प्राणी एक दूसरे से चिपककर  खड़े होकर सफर कर रहे  है।  एक हाथ में  इन प्राणियों ने  मोबाइल फोन पकड़ा होता है  और  दूसरे  हाथ से  खम्बा  अथवा  कोच के अंदर उपलब्ध कोई  और सहारा।  ज्ञांत  रहे  कि  इस मौसम में यह आम प्राणी भी  सर्दी-जुकाम  से ग्रस्त हो सकता है, और जब इसे खांसी  अथवा छींक आती है  तो  सीधे सामने खड़े  दूसरे प्राणियों के चेहरे पर खांसता और छींकता  है  क्योंकि  अफ़सोसन  इसमें अभी  वह  तमीज पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुई कि  मोबाइल  फोन को जेब में रख , छींकते और खासते वक्त के लिए अपना एक हाथ  अपने मुह को ढकने हेतु  फ्री रख सके।  नतीजन , अन्य प्राणियों को भी फ्री में सर्दी-जुकाम   मिलता है  और वह उसे घर जाकर अपने बच्चो में भी बाँट देता है।  विशिष्ट वर्ग  ने तो मीडिया में  चेहरा दिखाने के लिए एक दिन  साइकिल की सवारी कर ली ,बस।    ( विदित रहे कि  यह वही  लोग हैं जो खुद कभी  उस ख़ास वर्ग को निशाना बनाया करते थे )     

मैट्रो के डिब्बों में 'आसन व्यवस्था' की नई परिकल्पना !

मैट्रो के डिब्बों में 'आसन व्यवस्था' की नई परिकल्पना ! (New concept of 'seating arrangement' in Metro coaches ! ) ...